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प्रियदर्शन

BIZARRE: 7d0b486e dd42 44ca b656 bbc862ad85a2 - What They Never Told You

इसमें संदेह नहीं कि आज का जो चमकता-दमकता भारत है, विकास के मानकों पर तेज़ी से दौड़ता और अपने लिए तरह-तरह के लक्ष्य तय करता भारत है, वह संभव नहीं होता अगर मनमोहन सिंह ने 1991 के आर्थिक सुधारों का चक्का नहीं चलाया होता. आज आर्थिक सुधारों पर- उदारीकरण, निजीकरण और खगोलीकरण पर- जो राजनीतिक, बल्कि राष्ट्रीय- आम सहमति नज़र आ रही है, वह इन दिनों बिल्कुल नहीं थी और वाम से दक्षिण तक की राजनीति इसके विरुद्ध खड्गहस्त थी. यह उदारीकरण न वामपंथ की सैद्धांतिकी को रास आ रहा था न बीजेपी-संघ के तथाकथित स्वदेशी प्रेम को. बैंकों को, बीमा को या दूसरे क्षेत्रों को निजी क्षेत्र के लिए खोलने के फैसलों के ख़िलाफ़ तब जुलूस निकाले जाते थे. यहां तक कि कांग्रेस के भीतर भी इन सुधारों को संदेह की नज़र से देखा जा रहा था.

लेकिन शायद यह देश की मजबूरी थी- जो चंद्रशेखर सरकार के समय सोना गिरवी रखने की नियति तक पहुंची थी- कि भारत को अपनी आर्थिक नीतियों मे बदलाव करना था. इसके पीछे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक का दबाव भी बताया जाता था और चर्चा यहां तक चलती है कि उसी दबाव में नरसिंह राव ने मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री बनाने का फ़ैसला किया था.

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