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National
बसंत कुमार

SHOCKING: C6b9f978 f5cf 4964 9a1c 127c9c37a096 - What They Never Told You

21 मई को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया (पीसीआई) के चुनावों को लेकर एक बार फिर से सेंट्रल दिल्ली और पत्रकारिता के महकमों में गहमागहमी है. चुनाव के लिए उम्मीदवारों की घोषणा हो चुकी है. अमूमन हर शाम प्रेस क्लब के लॉन में पत्रकारों की टोलियां जमती हैं, मयनोशी की महफिलें सजती हैं, राजनीति की चीर-फाड़ होती है. लेकिन क्लब के चुनाव के दिनों में माहौल थोड़ा बदल जाता है. देश की सियासत से ज्यादा चर्चा पत्रकारों की अपनी सियासत ले लेती है. आम दिनों में अलहदा मेजों पर जमने वाले पत्रकार इन दिनों में मेज-दर-मेज जोड़कर अपने गुट का बल प्रदर्शन करते हैं. चुनाव जीतने की रणनीतियां बनती हैं. गुटों के बीच आपसी आरोप-प्रत्यारोप का मैच खेला जाता है, जो अक्सर क्लब कैंपस की सीमाओं को लांघकर सोशल मीडिया के असीमित मैदान में खेला जाने लगता है.

बीते साल प्रेस क्लब चुनाव में राजनीति का एक अलग स्तर दिखाई पड़ा था. विजयी पैनल (‘लखेड़ा, विनय, ज्योतिका’ पैनल), ने चुनौती देने वाले पैनल के ऊपर आरएसएस और भाजपा से मिलीभगत का आरोप लगाया था. कथित तौर पर आरएसएस-भाजपा के समर्थन वाला पैनल बीते साल चुनाव नहीं जीत पाया था. चीजें कमोबेश इस बार भी वैसी ही दिख रही हैं.

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